आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम्हीं से आज मैं तुमको मिलाने लाया हूं।

                
                                                         
                            मैं इतनी दूर जो तुमको घुमाने लाया हूं।
                                                                 
                            
तुम्हीं से आज मैं तुमको मिलाने लाया हूं।।

अभी मासूम हो नादाँ हो बड़ी भोली हो।
ये ना समझो कि मैं तुमको लुभाने लाया हूं।।

अपनी जानिब से मैं जहमत नहीं होने दूंगा।
ये ना कहना कि मैं तुमको सताने लाया हूं।।

तुमसे बेहतर कोई इंसान न देखा मैंने।
बस यहीं बात तो तुमको बताने लाया हूं।।

शक़्ल ऐ इंसान में तुम एक फरिश्ता ही हो।
तुम्हें ज़ालिम ज़माने से बचाने लाया हूं।।

कहां तुम और कहां ये "मेंहदी" की बस्ती ।
मैं तुमको दिल की दुनियां में बसाने लाया हूं।।
-इक़बाल मेंहदी काजमी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर