आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आप दावा करें और हम दलीलें भी नहीं रखें।

                
                                                         
                            हमसे कहते हैं कि, हम दिमाग़ अपना सही रखें।
                                                                 
                            
आप रिश्ता बदल दें और हम लहज़ा वहीं रखें ।।

हमें खामोश रहने की नसीहत आप न कीजिए।
आप दावे करें और हम दलीलें भी नहीं रखें।।

बिना सोचें हुए ही फैसला ये कर दिया तुमने ।
ये सारे दर्द और तन्हाइयां सब कुछ हमीं रखें।।

हमें इस दिल का क्या करना है न हमको बताइए।
तुमने ठुकरा दिया तो हम इसे चाहे कहीं रखें।।

ज़माने में हजारों ही ख़ुदाओं का बसेरा है।
ये तो मर्ज़ी हमारी है कहां अपनी जबीं रखें।।

हमारे सर पर जब "मेंहदी"लगे इल्ज़ाम इतने हैं।
लिखित तहरीर देने में भला हम क्यूं कमी रखें।।
-इक़बाल मेंहदी काजमी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर