आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सबको छोड़कर तू भी कहीं छिप जा।

                
                                                         
                            सुबह से कब शाम हो गई,
                                                                 
                            
ये पता न चला।
बचपन अचानक बूढ़ा हो गया,
ये भी पता न चला।

रिश्ते-नाते, घर-बार,
दफ़्तर, स्कूल, हाट, बाज़ार,
कहीं गुम हो गए, पता न चला।

ज़िंदगी, तुमको जीने आया था मैं भी,
ये एक बार का ही है,
ये पता न चला।

और अगर पता चल भी जाए तो,
उम्र गुज़री,
तन्ख्वाह आई-गई,
कनस्तर, पीपा कब टकराने लगे,
आवाज़ का पता न चला।

एक सांस चल तो रही है,
एक दुख हंस तो रहा है,
बेशर्मी भी ताने सहती चिढ़ा रहा है।

ऐ ग़म, तू आ,
तेरी फ़िक्र, तू आ,
तेरे कदमों के निशां,
ढूंढते हैं ख़्वाहिशों के निशां,
कुछ बाकी है तो वो भी साथ ला,
सबको छोड़कर तू भी कहीं छिप जा।

ऐ आसमां, तू...
इस बार खुद को ही निगल जा,
इस बार कोई क़यामत ला,
उसी में ही मुझे ले डूबा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर