सुबह से कब शाम हो गई,
ये पता न चला।
बचपन अचानक बूढ़ा हो गया,
ये भी पता न चला।
रिश्ते-नाते, घर-बार,
दफ़्तर, स्कूल, हाट, बाज़ार,
कहीं गुम हो गए, पता न चला।
ज़िंदगी, तुमको जीने आया था मैं भी,
ये एक बार का ही है,
ये पता न चला।
और अगर पता चल भी जाए तो,
उम्र गुज़री,
तन्ख्वाह आई-गई,
कनस्तर, पीपा कब टकराने लगे,
आवाज़ का पता न चला।
एक सांस चल तो रही है,
एक दुख हंस तो रहा है,
बेशर्मी भी ताने सहती चिढ़ा रहा है।
ऐ ग़म, तू आ,
तेरी फ़िक्र, तू आ,
तेरे कदमों के निशां,
ढूंढते हैं ख़्वाहिशों के निशां,
कुछ बाकी है तो वो भी साथ ला,
सबको छोड़कर तू भी कहीं छिप जा।
ऐ आसमां, तू...
इस बार खुद को ही निगल जा,
इस बार कोई क़यामत ला,
उसी में ही मुझे ले डूबा।
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