आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रोको मेरी ज़िद

                
                                                         
                            डर ये न था कि मैं हार जाऊंगा ,
                                                                 
                            
डर था कि वो मुझे जीतने से रोकेंगे,
हर लम्हा, हर राह पर टोकेंगे,
वो मुझे एक नज़र भर विलग खुदसे न छोड़ेंगे,
वो बेहद होकर मेरी राह की हद तय कर देंगे,
मैं गलियों से होकर फिर राह पर लौट आऊंगा,
वो जाने कैसे मेरी ज़िद को रोकेंगे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर