आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बोझ तुम्हारी यादों का

                
                                                         
                            झुकी झुकी सी पलकों पर है बोझ तुम्हारी यादों का
                                                                 
                            
झूठी रह गई कसमों का … रह गए अधूरे वादों का

अब तो संभल गया हूं लेकिन जब था मैं गर्दिश में
क्या ही मान रखा तब तुमने मेरी बेबस फरियादों का

तुमने न सही पर मैंने तो दिल से चाहा था तुमको
कुछ तो मोल रखा होता तुमने मेरे जज्बातों का

न ही गिला, न कोई शिकायत, बस खुद से शर्मिंदा हूं
अफसोस कि मेरा प्रेम ग्रन्थ किस्सा बना फसादों का
– हरवंश हृदय
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर