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डर की बेड़ियों को, वो अब तोड़कर उठे

                
                                                         
                            वो दिशाओं को चीरकर, अपना आसमान ले,
                                                                 
                            
अपनी ही शर्तों पर, वह सारा जहान ले।
किसमें है दम, जो उसकी उड़ान रोक ले,
यह उसी का वजूद है, जो अपनी कमान ले।

डर की बेड़ियों को, वो अब तोड़कर उठे,
हर अंधेरे को पछाड़, नई भोर चुने।
सामने जो आए कोई, राह रोककर,
हौसलों के समंदर में, तूफ़ान ले उठे।

वक़्त की इस धूप में, वो खुद को तपाएगी,
अपनी मेहनत से एक, नई तारीख़ बनाएगी।
रोक सके जो उसकी राहें, ऐसा कोई नहीं,
वो हर एक मुश्किल को, अपनी जीत बताएगी।
— तीरथ प्रसाद गुप्ता
 
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44 मिनट पहले

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