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पावस की हो रही विदाई

                
                                                         
                            पावस की हो रही विदाई,
                                                                 
                            
सरस शरद की सुखद अवाई।
घाट-बाट फिर से सुघरेंगे,
कीचड़ अब ना कहीं मिलेंगे।
बादल नभ से छँट जाएँगे,
नीले अंबर मन भाएँगे।
धुली धरा पर धूप खिलेगी,
हरियाली फिर से निखरेगी।
नदियाँ निर्मल नीर बहाएँ,
कमल-कली फिर मुस्काएँ।
मंद पवन जब तन सहलाए,
मन में नई उमंग जगाए।
धान की बाली गीत सुनाये,
गीत हमारे मन को भाये।
धान खेत से घर आएगा,
सोच-सोच कर मन हर्षाए।
शरद चाँदनी रात सजाए,
नभ में तारे मिल कर गाएं।
ओस-बूँद मोती सा चमके,
धरा का रूप निखर कर दमके।
पावस तुम अब विदा हो जाओ,
शरद, मधुर मुस्कान लुटाओ।
नई ऋतु खुशियाँ ले आए,
हर मन में उल्लास जगाए।
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46 मिनट पहले

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