जब ढलने लगी जीवन की डोर, तो मेरा जग सारा छिन लिया।
गोद सुनी, अधूरा जीवन आँखों का तारा छिन लिया।
सिखाया जिसे उँगली पकड़ चलना मैने, हाथ से वो फिसल गया।
छोटा था वो घर में सबसे, पर जीवन में आगे निकल गया।
घर का कोना कोना हँसी से गूँजता था,अब वही डर लगता है।
दीवारें भी याद दिलाते हैं बीते पल की, जीवन अब वीराना सफर लगता है।
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