आँखों में बेचैनी, चेहरों में शिकन, जिस्म में तनाव है।
नेता जी नजर आने लगे, लगता है जल्द चुनाव है।
फिर ठगी जायेगी जनता, फिर होंगे कसमें वादे,
फिर बनेगा कोई बादशाह, फिर मिटेंगे कुछ प्यादे।
कुछ जिस्म, कुछ किरदार कुछ इंसान बिकेंगे,
इन चुनावों में देखना, बड़े बड़ों के ईमान बिकेंगे।
चारों ओर शोर मचेगा, महफिलों का दौर होगा,
दिखेगा कोई, बिकेगा कोई, सिकंदर और होगा।
उम्मीदों का फिर नया बाजार सजाया जायेगा,
पुरानी बिसात पर नये मोहरों को बिछाया जायेगा।
कुछ कॉक्रोच भी आयेंगे नफ़रत का वायरस फैलाने,
हलाल करने को नये बकरों को बहकाया जायेगा,
षड़यंन्त्रों की महफ़िल में, मक्कारी के जाम छलकेंगे,
महक छुपाने को इत्र से क़ब्र को नहलाया जायेगा।
अखबारों से निकल, कागजी शेर गुर्राने लगेंगे,
कुछ गुंडे गली, मोहल्लों को थर्राने लगेंगे।
दीवारों पे ग़ालियों के पोस्टर जड़ने लगेंगे।
इश्को मोहब्बत भूल, भाई, भाई लड़ने लगेंगे,
न्योते पत्ते, जन्मों के रिश्ते नाते सब टूट जायेंगे
चुनावों के चक्कर में, बच्चे माँ बाप से रूठ जायेंगे।
कागजी वादे होंगे, कसमो के सिलसिले चलेंगे,
चुनाव ख़त्म होते ही,
फिर वो ना दिखेंगे।
यारो वोट की ताकत को पहचान जाओ अगर,
एक एक बूँद से समंदर बना डालोगे,
फकीर को भी बैठा दोगे तख़्त ओ ताज़ पे,
खुदा को भी खुश कर दे, वो मंज़र बना डालोगे।
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