तान्हा पोला का स्वरूप एवं परंपरा
तान्हा पोला आ गया, हर बालक हरषाए।
काठ-बैल सज्जित करें, मन में चाव समाए॥
मन में चाव समाए, सजाते नंदी झूला।
मोती घुँघरू बाँध, न कोई पूजन भूला॥
कह 'गोकुल' कविराय, विदर्भ बीच रस घोला।
घर-घर घूमें बाल, मनाते तान्हा पोला॥
पूजन, बोजारा और उत्सव का आनंद
तान्हा पोला शाम को, सजे गली-चौपाल।
तोरण बाँधे प्रेम से, पूजें नंदी बाल॥
पूजें नंदी बाल, बटे प्रसाद फिर सारा।
घर-घर जाकर बाल, माँगते है बोजारा ॥
कह 'गोकुल' कविराय, नाम लेकर शिव भोला।
'फूटा पोला' बोल, मनाते तान्हा पोला॥
उपसंहार एवं सांस्कृतिक संस्कार
तान्हा पोला पर्व यह, देता सुंदर सीख।
कृषि-संस्कृति के बीज की, मन में रोपे लीख॥
मन में रोपे लीख, सीख पशु-सेवा पावें।
धरती और किसान, मान उर बीच बसावें॥
कह 'गोकुल' कविराय, नन्हें हाथों रस घोला।
पीढ़ी दर यह शान, रहे नित तान्हा पोला॥
- गोवर्धन बिसेन 'गोकुल'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X