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मेरे अल्फाज़

सोया ही हुआ था मैं, हमेशा के लिए अभी-अभी

Gitesh Sharma

1 कविता

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भला हो मेरे उस दोस्त का

जो दुश्मन के रूप में आया।

सोया ही हुआ था, मैं अभी-अभी।।


उस -40℃ में चौबीस घंटे खडे़ रहना,

इस उम्मीद में कि मेरे भरोसे कोई सोया हुआ है।

सोया ही हुआ हूूूं, मैं अभी-अभी।।


मौत का डर न था मुझे,

न जीने कि ख्वाहिश थी,

बस बर्फ की गुफाओं में रहना था,

और तन्हायी में जिंदगी थी,

हाथ में तेरे फोटो थे और नींद भी अभी आई थी।।

किसी बेटे के लिए अपनी  माँ की गोद में सोना,

एक स्वर्ग के जैसा है।

पर फिर भी कोई उम्मीद नहीं है, आपसे।

बस एक इच्छा और अनुरोध है, आपसे।

दो गज जमीन और एक तिरंगा चाहिए, एक सिपाही के वास्ते।


मरने का गम नहीं था मुझे।

हाथ में तिरंगा था और लफ्ज़ पर "जय हिंद" का नारा था।

तभी एक बर्फ का झोंका आया और मैं उससे नीचे दब गया अभी-अभी।

सोया ही हुआ था मैं, हमेशा के लिए अभी-अभी ।।



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