स्वतंत्रता की हवाओं में लहराकर भी,
मेरा तिरंगा उदास रहता है,
आज़ाद होकर भी मैं आज़ाद नहीं,
आज चीख-चीख कर कहता है।
मैं आज भी कैद हूँ यहाँ,
संकीर्ण मानसिकता की गुलामी में,
जाति, धर्म के भेद-भाव में,
और ऊँच-नीच की दीवारों में।
अलग कर रहे हैं मुझको,
मेरी ही पावन मिट्टी और आत्मा से,
मत झुलसाओ इन पवित्र रंगों को,
तुम बँटवारे की ज्वाला से।
जाति, धर्म और भाषा की कैंची से,
मेरी पहचान को मत कतरो,
मैं सिर्फ कपड़ा नहीं,
करोड़ों धड़कनों का गौरव हूँ,
हज़ारों वीरों का बलिदान हूँ मैं,
सत्य, शांति की अनमोल धरोहर हूँ,
समृद्धि का पावन प्रतीक हूँ मैं,
इस अखंड भारत का स्वाभिमान हूँ।
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