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मैं तो हवा की बेटी हूँ, उड़ान ही है पहचान मेरी

                
                                                         
                            यह बात पुरानी लगती है,
                                                                 
                            
सब सुनी कहानी लगती है।
लगता है यह नारा है या है हवा में बहता शोर कोई,
क्या वो एक बेचारी है या पूजनीय वो एक नारी है।
हर धर्म सभा में पिसती है, बस हँसकर सब कुछ सहती है।
क्या अग्नि परीक्षा धर्म है?
बस चुप रहकर है मर्यादा उसकी?
क्या हक़ नहीं उसका इस आसमान पे उड़ने का?
क्यूँ ये शक्ति सिर्फ़ नारा तक रह जाती है?
क्या यही कहानी का अंत है?
छोटी उम्र में बेड़ियाँ, या शायद सिर्फ़ चूड़ियाँ हैं।
क्या फ़र्क है?
धुन दोनों की एक सी लगती है।
मुझे कभी चूड़ियों में हथकड़ियाँ नज़र आएँ,
तो कभी चमकते पायल में वही पुरानी बेड़ियाँ दिखती हैं।
ये कहानी जब पुरानी हैं तो इसे पुनः लिखना है काम मेरा।
मैं तो हवा की बेटी हूँ, उड़ान ही है पहचान मेरी
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3 घंटे पहले

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