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नमन...

                
                                                         
                            सब कुछ शांत था तब पर भी
                                                                 
                            
सीमा पर बमबारी थी
बात नहीं थी कुछ भी पर
पाक की यह बीमारी थी.

सीमा का उल्लंघन करना
उसका काम पुराना था
एल.ओ.सी. का पालन करना
यह तो बस बहाना था.

टोह कर इन घुसपैठों को
सैनिक तब हरकत में आए
भारत के पांच सिपाही
पाक ने जब मार गिराए.

कारगिल, द्रास, काकसर, मुश्कोह
तक घुसपैठी बढ़ आये थे
संख्या में थे ये पांच हजार
और टिड्डी दल से छाये थे.

देखकर ओछी ये करतूतें
कोई कैसे चुप रहता
अपने ही घर में घुसपैठों को
कोई भला कैसे सहता.

आसमान भी कांप उठा तब
भारत ने जब किया प्रहार
मिग सत्ताईस उन्नतीस फिर
गोले दागे लाख दो पचास हजार.

मौसम था यह गर्मी का
पर चोटी बर्फीली थी
दिक्कत बहुत सी थी आई
पर सेना भी हठीली थी.

सर्दी, गर्मी, बारिश का ये
अद्भुत ही नजारा था
सत्रह गोली खाकर जब एक
सैनिक ने शत्रु को ललकारा था.

कितने ही जांबाजो के
सीने छलनी हो आये थे
फिर भी मुँह से आह न निकली
ये किन मांओं के जाये थे.

दुश्मन के बंकर में घुस कर
एक – एक को मारा था
जीत कर ही कदम रुकें
ये हर सैनिक दहाड़ा था.

विक्रम, आचार्य, अजय महान
अनुज, नानग्रुम, संजय, बलवान
देख कर जिनको दुश्मन थे रोये
ऐसे जांबाज युद्ध में धरा ने खोये.

देकर अपनी जान की बाजी
भारत का परचम लहराया
धन्य - धन्य वह सैनिक है
जो मां के अपने काम है आया.

साठ दिन तक चली लड़ाई
पाक ने फिर मुंह की खाई
अपनी ही करतूतों से उसने
बची हुई इज्जत भी गंवाई.

कारगिल की चोटी पर फिर
भारत का झंडा लहराया था
जीत के इस अवसर पर
देश ने विजय दिवस मनाया था.

उस दिन तो भारत मां का भी
आंचल नम हो आया था
उनके वीर सपूतों का शव जब
तिरंगे में लिपटा आया था.

धन्य धन्य वे मायें हैं
जिसने ऐसे लाल जने
इन मांओं के कारण ही तो
भारत देश महान बने.

नेत्र अश्रु से पूरित हैं
इन वीरों के बलिदानों पर
नतमस्तक है आज ‘एकता’
ऐसे वीर महानों पर.

इनकी कुर्बानी केे खातिर ही
हम आज चैन से सोते हैं
जाने कौन से वो पुण्य प्रताप
जिनसे अपने बच्चे ऐसे होते हैं.

उन्नीस साल बीत गये आज
कारगिल की इस घटना को
मां भारती नींद से उठ जाती हैंं
‘फिर न देखूँ इस दुर्घटना को’.

मां है वह खुद से कैसे
अपने बच्चों का त्याग करे
पर इस दुःख के साथ कैसे वह
हर दिन ही निर्वाह करे.

उसके कुछ लाल तो उसकी
रक्षा में प्राण गंवाते हैं
पर उनको कैसे अपना बेटा माने
जो उसका ही दूध लजाते हैं.

सीमा के घुसपैठों की छाती पर तो
सेना चंडी जैसी बैठी है
पर उनका क्या कुछ कोई करे
जो देश के अंदर के घुसपैठी हैं.

पर उनका क्या कुछ कोई करे
जो देश के अंदर के घुसपैठी हैं.


- एकता बृजेश गिरि

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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