ये दिन कितने जल्दी ढले जा रहें हैं।
हम यूँ हीं सफर में चले जा रहे हैं ।
लिखा ही नही है कि मंजिल कहां हैं।
पता पुछते हम चले जा रहे हैं।
जमाना है बैठा उम्मीदें लगाए,
मना कर सभी को जिए जा रहे हैं।
लगा था सफर में मिलेगा कोई तो,
जहन का भरम था या दिल को,
तस्सली दिये जा रहें हैं।
चले थे सफर में मुसाफीरों की तरह,
मिला जो सफऱ में संग उसको सफर में,
लिए जा रहें हैं।
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