"मैं शून्य हूँ, पर अनंत हूँ"
(मेरी आत्मकथात्मक कविता)
जीवन भर संघर्ष किया,
अपना सुख-चैन गँवाया है।
अपनों के हित दीपक बनकर,
खुद को जलना सिखाया है।
मेरे त्याग को त्याग न समझा,
मेरे दर्द को किसने जाना?
जिनके लिए स्वयं को भूला,
उन्होंने ही शून्य मुझे माना।
पर शून्य नहीं हूँ, शक्ति हूँ मैं,
अपने संकल्पों का वसंत हूँ।
ठोकर खाकर भी बढ़ता जाऊँ,
मैं शून्य हूँ, पर अनंत हूँ।
न तिरस्कार से मूल्य घटेगा,
न मौन से मेरी पहचान मिटेगी।
मेरे कर्मों की उजली आभा,
एक दिन मेरी कथा लिखेगी।
न बदले की चाह हृदय में,
न किसी से प्रतिकार है।
अपना मान बचाए रखना,
जीवन का सच्चा सार है।
मैं अपनी पहचान बनाऊँगा,
कर्मों से इतिहास रचाऊँगा।
खुद भी बढ़ूँ, अपने भी बढ़ें,
सबके जीवन में मान बढ़ाऊँगा।
मैं शून्य हूँ, पर अनंत हूँ,
संघर्षों से बनी पहचान हूँ।
तिरस्कार मुझे झुका न पाए,
मैं अपने मूल्यों का सम्मान हूँ।
-प्रदीप बाबू
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