" जाम ही जाम "
चारों ओर लगा है जाम,
रुका हुआ है सारा काम।
सड़क पर गाड़ियों की कतार,
हर कोई है बड़ा लाचार।
बोले कोई—“जल्दी जाना है”,
कोई बोले—“देर हो जाना है।”
हॉर्न बजें सुबह से शाम,
भाई! चारों ओर लगा है जाम।
घर से निकले लेकर काम,
रास्ते में मिल गया जाम तमाम।
आगे बस और पीछे कार,
बीच में फँसा स्कूटर सवार।
हॉर्न बजा-बजा थक जाएँ,
गाड़ी फिर भी आगे न जाए।
दफ्तर छूटा, छूटी ट्रेन,
मिला नही हमे कही भी ठौर,
चेहरे पर दिखने लगा परेशानी का दौर।
मंजिल पास, मगर बेकार,
जाम ने कर दिया इंतजार।
ट्रैफिक वाला हाथ उठाए,
सबको धीरे-धीरे समझाए।
“भाई, धीरज थोड़ा धरना,
हॉर्न बजाकर क्या है करना?”
कोई बोले—“मेरी गलती नहीं”,
दूजा बोले—“मेरी गलती नहीं।”
सबके अपने-अपने काम,
किसके कारण लगा ये जाम?
बहस हुई और बढ़ा बवाल,
जाम बना है मजेदार सवाल।
शाम हुई तो बदला नाम,
गिलासों में सजने लगा जाम।
एक बोला—“आज है आराम”,
दूजा बोला—“भर दो जाम।”
पहला जाम गया मुस्काकर,
दूजा पहुँचा लड़खड़ाकर।
तीसरे ने जब खोला ज्ञान,
सबने पकड़े अपने कान!
घरवाली बोली—“बस भी करो,
कल फिर सड़क का जाम भरो!”
सड़क का जाम करे परेशान,
गिलास का जाम करे हैरान।
एक में गाड़ी रुकती जाए,
दूजे में हाथ पैर डगमगाएँ।
एक में देर से पहुँचे धाम,
दूजे में भूलें अपना नाम।
दोनों का है अपना काम—
एक सड़क पर, दूजा गिलास में जाम l
जाम जिंदगी में आते हैं,
रुककर फिर चलना सिखलाते हैं।
मुश्किल में भी रखना धीर,
हँसकर रहना सदा गंभीर।
रास्ता चाहे हो बदनाम,
हँसते-हँसते काटो जाम।
सड़क खुले या बीते शाम,
जीवन चलता रहे अविराम।
यही जिंदगी का है पैगाम—
रास्ते में आए लाखों जाम,
मुस्कुराकर चलते रहो,
मत रुकने दो जीवन का काम।
-प्रदीप बाबू
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X