आजकल मंज़र बड़ा खराब देख रही हूं मैं
भाई का हक़ छिनते भाई के हाथ देख रही हूं मैं
वो जो भी है, हैं खिलाड़ी बड़ा शातिर मगर
शिकारी को होते खुद शिकार देख रही हूं मैं
तुमसे बात करके पड़ जाती हूं कश्मक़श में मैं
हमजुबां को आज मेरे खिलाफ देख रही हूं मैं
तिनका -तिनका बुना, कदम- कदम संभाला
तुम बड़े क्या हुए खुद को खार देख रही हूं मैं
ड़़रती हूं बिखर न जाएं ये आशियाना मेरा
तुम्हारे लफ़्ज़ों में अब मेरी हार देख रही हूं मैं.
-अर्ज़िनबी युसुफ शेख.
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