आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आजकल मंज़र

                
                                                         
                            आजकल मंज़र बड़ा खराब देख रही हूं मैं
                                                                 
                            
भाई का हक़ छिनते भाई के हाथ देख रही हूं मैं

वो जो भी है, हैं खिलाड़ी बड़ा शातिर मगर
शिकारी को होते खुद शिकार देख रही हूं मैं

तुमसे बात करके पड़ जाती हूं कश्मक़श में मैं
हमजुबां को आज मेरे खिलाफ देख रही हूं मैं

तिनका -तिनका बुना, कदम- कदम संभाला
तुम बड़े क्या हुए खुद को खार देख रही हूं मैं

ड़़रती हूं बिखर न जाएं ये आशियाना मेरा
तुम्हारे लफ़्ज़ों में अब मेरी हार देख रही हूं मैं.
-अर्ज़िनबी युसुफ शेख.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर