जीवन का एक दौर बड़ा ही कष्टों वाला होता था,
मैं भीतर से टूट चुका था, जब मैं हर दिन रोता था।।
रोता न तो क्या करता मैं, जब जीवन ने दुत्कार दिया था,
जीवन ने जीवन बनने से पहले ही जब मार दिया था।
अन्तःकरण बिखर बैठा था, अंतर-मंतर टूट चुका था,
कहने को जो अपने थे सब, उनका भी साथ छूट चुका था।।
टूट चुका था इस सीमा तक, जैसे जीवित लाश बना था,
फिर भी जीतूँगा इक दिन मैं, यह अंतिम विश्वास बना था।
सूनी-सूनी इन आँखों में अनायास ही नीर भरे थे,
कोई सुनने वाला न था, बस तानों के ही तीर गिरे थे।।
अपनों की बेरुखी देखकर, धीरज मेरा खोता था,
अंगारों की शय्या पर ही, जीवन मेरा सोता था।।
जीवन का एक दौर बड़ा ही कष्टों वाला होता था,
मैं भीतर से टूट चुका था, जब मैं हर दिन रोता था।।
मुझको खुद भी याद नहीं, किस हद तक मैं जाग चुका था,
नदी-समंदर वाली अपनी शीतलता को त्याग चुका था।
त्याग रहा था धीरे-धीरे हर झूठी रिश्तेदारी को,
क्योंकि समझ गया था अपनी सारी ज़िम्मेदारी को।।
ज़िम्मेदारी घर की, माँ के गहने बेचे जाने की,
बापू की खोई मुस्कानें, फिर से वापस लाने की।
होता था छलनी सीना, जब पिता का झुकता माथा था,
ख़ुद की हिम्मत बेच-बेच कर, हर तूफ़ान उठाता था।।
छाती पर पत्थर रखकर मैं, हर दिन ज़हर संजोता था,
किस्मत के बंजर खेतों में, कुछ उम्मीदें बोता था।।
जीवन का एक दौर बड़ा ही कष्टों वाला होता था,
मैं भीतर से टूट चुका था, जब मैं हर दिन रोता था।।
भूख निगल कर रातों को, सपनों की चिता जलाता था,
पाँव में छाले पड़ जाते, फिर भी मंज़िल तक जाता था।
दुनिया हँसती थी मुझ पर, मैं भीतर अंगारे बोता था,
हर दिन, हर पल, हर क्षण ख़ुद को, ख़ुद ही ख़ुद में खोता था।।
किंतु तिमिर के उस परदे से, इक नया सवेरा उगना था,
रो-रोकर जो मिट्टी सींचा, उसमें फूल महकना था।
गिर-गिरकर हर बार उठा मैं, नया हौसला गढ़ता था,
जब-जब दुनिया ने था पटका, मैं तब-तब दुगना बढ़ता था।।
काली रातों के सीने में, मैं ही दीप पिरोता था,
अपने ही अश्रुओं से अपनी, तक़दीरें मैं धोता था।।
जीवन का एक दौर बड़ा ही कष्टों वाला होता था,
मैं भीतर से टूट चुका था, जब मैं हर दिन रोता था।।
- डॉ. विकास चौरसिया
फतेहपुर, उत्तर-प्रदेश
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