इस दह्र में जीने का हुनर है कि नहीं है
इंसा को बचाने की खबर है कि नहीं है
करके जो गुनाहों को न बेचैन कभी हो
रब का कोई दिल में उसे डर है कि नहीं है
-फ़ौज़िया नसीम शाद
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