ये जो रेलगाड़ी शहर के स्टेशन पर आयी है
मेरे गांव को शहर में उठा लायी है।
मेरे गांव की फैली खुशियां को छीनकर
आंखों में आंसुओं की बरसात ले आयी है।
मेरा गांव शहर में सिमटता जाता है
मानों गांव को बर्बाद करने की कसम खायी है।
मौसम की मार गांव में जिंदगी पर ऐसी छायी है
जीवन जीने की शिद्दत शहरों में खींच लायी है।
आसमां तले खेत खलिहानों तक फैली जिंदगी
आज शहरों के छोटे कमरों में सिमट आयी है।
गांव की पगडंडियों पे दौड़ने वाली जिंदगी
आज शहर की सड़कों पर लड़खड़ायी है।
दिनेश यादव
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