नारी
दर्द सहकर भी जो मुस्कुराती है,
इस भू पर वह नारी कहलाती है।
अपने सन्तानों से ही सतायी जाती है,
अबला और कमजोर बतायी जाती है।
अपने रिश्तों की खातिर चेतन से जड़
बन जाती है,
क्षीर छुपाकर स्तन में आंखों से नीर
बहाती है।
नारी ने सृष्टि सृजन का बोझ उठाया है,
इसलिए धरा पर देवी का रूप पाया है।
हर धर्म ने नारी पर ही नियम बनाए हैं,
उसकी आजादी पर प्रतिबंध लगाए हैं।
नारी शक्ति हर मुश्किलों से लड़ जाती है,
वह धरती पर ममतामयी माँ कहलाती है।
दिनेश यादव
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