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अपने जीवन के हर पल में

                
                                                         
                            अपने जीवन के हर पल में
                                                                 
                            
जिसने देश संजोया हो।
उसकी मृत्यु पर कोई नहीं
ऐसा जो ना रोया हो।

उस नारी शक्ति को देश की भक्ति को
नम आँखों से विदा करने के लिए।
ऐसा कभी नहीं हुआ है कि
हिंदुस्तान में आँसुओं का सैलाब सोया हो।

जग को ऊष्मा देते-देते
‘सुषमा’ जी चली गई है।
हर भारतवासी को ऐसा लगता है
जैसे अपना कोई मित्र खोया हो।

युगों-युगों में कभी-कभार
ऐसी नारी शक्ति आती है।
जिसने दुनिया में आगे बढ़कर
मानवता को संजोया हो।

कालगति के अन्तकाल में जाकर भी
जिसने देश के बारे में सोचा हो ‘दिनेश’।
उस सुषमा रूपी शक्ति के जाने की याद में
संभवतः हमने भी देश के बारे में सोचा हो॥

(स्वर्गीय श्रीमती सुषमा स्वराज जी को छोटी सी श्रद्धांजलि)


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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