तट नदी का वृक्ष बरगद लहर गाती प्रेम गाथा
घाट का पत्थर अकेला समझ कुछ नहीं पाता.
क्षितिज से आती हवाएँ दर्द रह रह कर उठाएं
कूल का पीपल सब देखे कह मगर नहीं पाता.
नीम ऊसर में खड़ी, हर बूँद की जो चाह रखती
देखकर जल राशि को भर कभी मन नहीं पाता.
घाट की शैवाल ले हिलोरें लहर संग जब बहकती
प्रतिबिंब कोई दीवार पर सेतु की रुक नहीं पाता.
लोग जो कहते रह गये घाट ने वह सब सह लिए
वृक्ष साक्षी बन गये पर नदी जल रुक नहीं पाता.
-दिनेश चौहान
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