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रात संग चलने लगी

                
                                                         
                            सुबह बीती दोपहर संग शाम भी ढलने लगी
                                                                 
                            
छा गया फिर कुहासा रात संग चलने लगी.

कुछ तरंगे झील से उठ पास मन के आ गईं
बदलियों ने साथ छोड़ा धूप संग चलने लगी.

कुछ दरख्तों का ये झुरमुट बीच सूना नदी तट
दूर कश्ती जो दिखी पतवार फिर चलने लगी.

वानप्रस्थी छोड़ कर घर जंगलों को चल पड़े
पीढ़ियां नव, ढंग अपने हाथ से चलने लगी.

चाँद तारे और मौसम समय पर बदले सभी
सीढ़ियां वर्षों की दिन रात संग चलने लगी.
-दिनेश चौहान
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एक घंटा पहले

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