आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पितृपक्ष में कौवे दुर्लभ हो जाते हैं

                
                                                         
                            तिथियाँ पितृपक्ष की जब से आयीं
                                                                 
                            
कौओं की पूछ हुई और बन आयी.

इंतजार करते हैं स्वागत करते हैं
खोजने पर भी कौवे नहीं मिलते हैं.

काक शास्त्र पढ़ डाला सारा हमने
भेद ना चालाकी का पाया हमने.

कोयल के पीछे पीछे चलते हैं ये
बच्चे भी उसके मिल कर सेते ये.

घूरे के दिन भी लौट कभी आते हैं
पितृपक्ष में कौवे दुर्लभ हो जाते हैं.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर