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क्या यही प्रेम होता है ?

                
                                                         
                            रुक रुक कर चलना
                                                                 
                            
चल कर फिर रुकना
दोनों नयनों का मिलना
निर्झर बन कर बहना
अंकुरित प्रेम का होना
अंदर तरंग का उठना
नम अंतस का हो जाना
क्या यही प्रेम होता है ?

धूप छांव का अन्तर
बेअसर हो जायें मन्तर
काम करे ना कोई
असरदार भी जंतर
दिन रात दिखे बस उसको
अपने प्रेमी का मुखमण्डल
आँखों का पथरा जाना
क्या यही प्रेम होता है ?
-दिनेश चौहान
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17 घंटे पहले

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