जुल्फों के साये में उनके शाम जब जब ढलती रहीं
हरेक रात रंगीनियों के गुल सुबह तक खिलाती रही
दिन का उजाला मुँह चिढ़ाता दिखा किरणों के संग
हर याद लम्हों के बियाबान जंगल से गुजरती रही.
-दिनेश चौहान
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