आओ बौछारों में भींगे सावन का मनुहार करें
प्रेम सिक्त हों भाव हमारे धरती का शृंगार करें.
दलदल मिट्टी कण कण सिंचित जल रेखांकित
टेर दादुरों की मन उत्कंठित कर व्यवहार करे.
घन आच्छादित व्यथित गगन चिंतित चातक
चमक चमक दामिनी भी वैचारिक संहार करे.
निर्जन वीथिका जल कोलाहल बना हलाहल
सूने मन में शोर कुपित कर शान्ति आहार करे.
दूत मेघ नहीं बनते अब संवादों का अंत हुआ
मावस की काली रातों में अब कैसा आचार करे .
-दिनेश चौहान
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