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मुखौटा और यथार्थ

                
                                                         
                            घिरे गिरे लोग यहाँ हैं,
                                                                 
                            
जीवन रेखा पार देखा।
रोटी, कपड़ा, मकान चाहिए,
शटर बंद दुकान देखा।
न्याय, अदालत से दूर हुए,
बंद कान सरकार को देखा।
अंग हमारे कौन भले हैं,
समय हमारे कौन बड़े हैं?
पहने टाई-बेल्ट में उनको,
कॉलर टाइट, सेंट में देखा।
प्रदूषण से क्या मतलब है?
बुलेट कार, धुआँ देखा।
नागरिकता पर चौड़ी छाती,
कटती नाक कमाल देखा।
एक पे एक टूटते कैसे,
प्यासा और मरते देखा।
मानव का मानव रूप,
गलते और घटते देखा।
दुख के अतिशय रूप को,
कीमत में चढ़ते देखा।
महंगाई से घिरे लोग,
पैसा, रुपया गायब देखा।
एक-एक टूटते कैसे,
प्यासा और मरते देखा।
सुख-दुख के बीच में,
ताने और तनाव देखे।
कविता लिखते भाव बढ़ते,
उठी नजर खराब देखा।
नशा दौर का वो बता रहे,
शराब पीते बच्चा देखा ।।


 
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2 hours ago

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