आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शिक्षा व संस्कार

                
                                                         
                            एक का नाम शिक्षा, दूसरे का संस्कार ।
                                                                 
                            
शिक्षा फल देती है, संस्कार जड़ देता है
शिक्षा कहती देखो कीतनी ऊंची हूँ।
संस्कार कहता है देखो कितना गहरा हूँ।
अच्छा है, ऊंचा होना,
पर गहरा होना है और जरूरी ।
आंधी में ऊँचे पेड़ पहले गिरते हैं,
गहरे पेड मजबूती से जमे रहते है।

बेटे ने टॉप किया, माँ ने मिठाई बाँटी,
पर उसी बेटे ने जब कहा -
"माँ तुम कुछ नहीं जानती"
तो मिठाई कड़वी हो गई।
यही है संस्कार विहीन शिक्षा।
संस्कारी शिक्षा तो वो है
जो बेटे को कहे ,बेटा टॉप तो कर,
पर पहले इंसान बन।
क्योंकि दुनिया को, टॉपरों से ज्यादा ,
अच्छे इंसानों की जरूरत है।

शिक्षा ने उन्हें आई ए एस - आई पी एस , एम एल ए एम पी तो बना दिया,
पर संस्कार ने उन्हें इंसान नहीं बनाया,
इसीलिए वर्दी तो है,पर वर्दी में दर्द नहीं। कुर्सी तो है ,पर कुर्सी में करुणा नहीं है।
और जब नेता और अफसर दोनों,
संस्कारहीन हो जाएं,
तब समाज एक बाजार बन जाता है,
जहाँ ईमान बिकता है, धर्म बिकता ,
और अंत में देश बिकता है।
कुर्सी और कलम तो एक दिन छूट जाएगी,
पर दुष्परिणाम तो देश भुगतता है।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर