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पर आपने खुद को ठीक किया कितना?

                
                                                         
                            कहते हैं मानवता मर गई,
                                                                 
                            
मैं कहता हूँ नहीं,अभी जिन्दा है।

वो इंसान जो ,भूखे को खिलाकर ,
एक गिरे को उठाकर,रोते को हँसा कर,
वो डॉक्टर, जो गरीब से फीस नहीं लेता,
वो शिक्षक,जो गरीब बच्चे को,
शाम को मुफ्त पढ़ाता है,
उनमें मानवता जिंदा है।

लोग रोज़ शिकायत करते हैं,
देश खराब है,समाज खराब है,,
सिस्टम खराब है,
पर आपने खुद को ठीक किया कितना?

मानवता कोई भाषण नहीं,
जो मंच से दिया जाए,
मानवता एक कर्ज है,
जो धरती पर जन्म लेकर,
चुकाना पड़ता है।

जब तक,एक भी आदमी,
दूसरे के दर्द पर रोता है,
तब तक मानवता मरी नहीं है।

भीड़ बहुत है पर इंसान कम है,
आज इंसान को इंसान की जरूरत नहीं,
उसे सिर्फ इस्तेमाल की जरूरत है,
मतलब निकला तो इंसान पराया।
फिर भी एक उम्मीद है,
जब भी कोई अनजान बिना नाम पूछे,
आप के मदद के लिए हाथ थाम ले,
समझना मानवता अभी भी उसी भीड़ में,
कहीं खड़ी है, तुम्हारा इंतजार कर रही है।

इसीलिए इस दुनिया को,
मानवता चला रही है।
जिसमें मानवता है,
उसी में ईश्वर का निवास है।
-देवेंद्र मणि पाण्डेय 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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