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ये कैसा समाज बना दिया

                
                                                         
                            ये कैसा समाज बना दिया
                                                                 
                            

ये कैसा समाज बना दिया हमने,
जहाँ इंसान की कीमत उसके कपड़ों से है,
दिल कितना बड़ा है कोई नहीं पूछता,
जेब कितनी बड़ी है सब यही देखते हैं।

यहाँ मंदिर में भी लोग
भगवान से नहीं, स्टेटस से मिलते हैं,
दान भी दिखावे का हो गया,
पुण्य भी कैमरे में तुलता है।

बेटे को कहते हैं - लड़के रोते नहीं,
और फिर कहते हैं - ये पत्थर दिल क्यों है?
बेटी को कहते हैं - ज़्यादा हँसो मत,
और फिर कहते हैं - ये उदास क्यों है?

हमने रिश्ते तो बना लिए बहुत,
पर निभाना भूल गए,
घर तो बना लिए आलीशान,
पर घर में रहना भूल गए।

कोई गिर जाए तो वीडियो बनाते हैं,
मदद को हाथ नहीं बढ़ाते हैं,
सच बोले तो अकेला रह जाता है,
झूठ बोले तो तालियाँ बजती हैं।

पर सुनो,
समाज हमसे ही तो बनता है,
हम बदलेंगे तो ये भी बदलेगा,
एक दिया तुम जलाओ,
एक दिया मैं जलाता हूँ,
अँधेरा खुद-ब-खुद डर जाएगा।
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1 hour ago

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