तुम नहीं हो, तो शाम नहीं ढलती,
बस आँखों में कहीं अटकी रहती है।
चाय ठंडी हो जाती है हाथों में,
और बात अधूरी सी भटकी रहती है।
तुम्हारी साड़ी अभी भी खूँटी पर है,
उसमें तुम्हारी ही खुशबू बसी है,
मैं उसे छूता नहीं, डरता हूँ,
कहीं वो भी तुम जैसी रुठ गई तो।
आँगन में वही नीम है, वही चबूतरा है,
बस तुम्हारी हँसी की जगह खाली है,
रात को जब किवाड़ बजते हैं हवा से,
लगता है तुम आई हो, पर सिर्फ हवा खाली है।
लौट आओ, तो कहूँगा नहीं कि देर हुई,
बस तुम्हारे पास बैठा रहूँगा चुपचाप,
इतना विरह बहुत है एक जनम के लिए,
अब मिलन में ही बीते बाकी हिसाब।
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