आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब मिलन में ही बीते बाकी हिसाब।

                
                                                         
                            तुम नहीं हो, तो शाम नहीं ढलती,
                                                                 
                            
बस आँखों में कहीं अटकी रहती है।
चाय ठंडी हो जाती है हाथों में,
और बात अधूरी सी भटकी रहती है।

तुम्हारी साड़ी अभी भी खूँटी पर है,
उसमें तुम्हारी ही खुशबू बसी है,
मैं उसे छूता नहीं, डरता हूँ,
कहीं वो भी तुम जैसी रुठ गई तो।

आँगन में वही नीम है, वही चबूतरा है,
बस तुम्हारी हँसी की जगह खाली है,
रात को जब किवाड़ बजते हैं हवा से,
लगता है तुम आई हो, पर सिर्फ हवा खाली है।

लौट आओ, तो कहूँगा नहीं कि देर हुई,
बस तुम्हारे पास बैठा रहूँगा चुपचाप,
इतना विरह बहुत है एक जनम के लिए,
अब मिलन में ही बीते बाकी हिसाब।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर