आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम्हारी एक झलक में सारा जहाँ हूँ।

                
                                                         
                            तुम आई तो हवा भी ठहर गई,
                                                                 
                            
जूही की खुशबू गहरी हो गई।

तुम्हारी आँखों में काजल नहीं, सावन है,
जिसमें मैं हर बार भीग जाता हूँ,
तुम्हारी हँसी में पायल की छनक है,
जिसे सुन के मैं खुद को भूल जाता हूँ।

तुमने जब बालों को कंधे से हटाया,
शाम ने भी करवट बदली,
तुम्हारी साड़ी का वो हल्का सा कोना,
जैसे चाँद पर घटा फिसली।

तुम्हारे होंठ - जैसे दोपहर में दो पत्ते,
गुलाब से भी ज़्यादा नरम,
तुम्हारा छूना - जैसे पहली बारिश,
मिट्टी को जैसे मिला मरहम।

मत देखो ऐसे, मैं बहक जाऊँगा,
मैं तो वैसे ही तुम्हारा हूँ,
तुम पास हो तो वक़्त भी रुक जाए,
तुम्हारी एक झलक में सारा जहाँ हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
48 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर