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सामाजिक मुद्दों पर

                
                                                         
                            सड़कों पर चमकती गाड़ियाँ हैं,
                                                                 
                            
दुकानों में सजे पकवान हैं,
एक बच्चा काँच के उस पार खड़ा,
सोचता है - क्या ये मेरी ही दुकान है?

एक तरफ थाली में बच जाता है,
एक तरफ थाली ही नहीं है,
हमने तरक्की तो बहुत कर ली,
पर भूख आज भी वहीं है।


आदमी ने आदमी को बाँट दिया,
लकीरों में, नामों में, सड़कों में।

जन्म से कोई ऊँचा कैसे हो गया?
जन्म से कोई नीचा कैसे हो गया?
जब लहू का रंग एक ही है,
तो ये भेद कैसा हो गया?

3. औरत

वो बेटी है तो बोझ कहते हैं,
बड़ी हो तो दहेज़ कहते हैं,
काम करे तो शक करते हैं,
चुप रहे तो कमज़ोर कहते हैं।

उसे लक्ष्मी भी कहते हैं,
और उसी से डरते भी हैं,
पूजा उसकी तस्वीर की करते हैं,
और हक़ उसकी तकदीर का छीनते हैं।

4. खोया हुआ बचपन

पहले गली में शोर होता था,
गिल्ली-डंडा, कंचे, चोर होता था,
अब हर हाथ में स्क्रीन चमकती है,
बचपन है, पर मौन होता है।

माँ पास है, पर ऑनलाइन है,
पिता घर में है, पर मीटिंग में है,
बच्चा हँसता है इमोजी में,
और रोता है अकेले में।
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48 मिनट पहले

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