प्रेम शरीर नहीं,
प्रेम तो आत्मा का नाम है,
एक देह दूसरे देह को चाहे,
ये तो बस आकर्षण है,
प्रेम तो वो है जहाँ
आत्मा आत्मा को पहचाने।
प्रेम में पाना नहीं होता,
प्रेम में खोना होता है,
जैसे मीरा खो गई कृष्ण में,
और कृष्ण हो गई,
जैसे कबीर डूबा खुद में,
और मोती हो गया।
प्रेम शोर नहीं करता,
प्रेम मौन में बोलता है,
एक नज़र, एक ठहराव,
एक बिना कहे समझ जाना,
यही तो प्रेम है।
लोग कहते हैं प्रेम में दर्द होता है,
मैं कहता हूँ,
प्रेम में दर्द नहीं,
प्रेम की अनुपस्थिति में दर्द होता है,
जहाँ प्रेम है,
वहाँ तो बस आनंद है।
तो प्रेम करो,
पर ऐसा करो कि
तुम मिट जाओ,
और प्रेम रह जाए।
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