किसी को चाहने का यदि बिल आता,
तो आज की तारीख़ में
शायद प्रेम सबसे महँगा होता
न कोई मुद्रा उसे चुका पाती,
न कोई हिसाब उसे बाँध पाता।
क्योंकि आज भी
चाहना व्यापार नहीं,
अपने भीतर किसी के लिए
एक स्थान रिक्त कर देना है
बिना यह सुनिश्चित किए
कि वहाँ लौटकर आएगा भी।
फिर भी प्रेम का सौंदर्य यही है
वह प्रतिफल की प्रतीक्षा में नहीं,
अपने होने की सार्थकता में पूर्ण होता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X