सुबह 7:23 की लोकल,
और उसके साथ 7 करोड़ सपने।
यहाँ AC नहीं, पसीना है।
यहाँ सीट नहीं, संतुलन है।
यहाँ "Excuse me" नहीं,
"भाई थोड़ा सरक" है।
*लोकल में संघर्ष कैसा दिखता है?*
1. *चढ़ना ही आर्ट है*
गेट पर लटके 4 लोग, अंदर 40 लोग।
फिर भी तुम घुस जाते हो,
क्योंकि ऑफिस में 9 बजे बॉस घुस जाता है।
ये हिम्मत IIT में नहीं सिखाते।
2. *वेंडर का मोटिवेशन*
"चाय गरम, वड़ा पाव गरम"
प्लेटफॉर्म बदलता है, ट्रेन बदलती है,
पर आवाज नहीं बदलती।
गिरता है, उठता है, फिर बेचता है।
यही तो असली hustle है।
3. *छात्र से CEO तक का सफर*
एक डिब्बे में JEE की किताब,
दूसरे में डिलीवरी का बैग,
तीसरे में इंटरव्यू वाली शर्ट।
सबकी मंजिल अलग,
पर ट्रेन एक।
नाम है - संघर्ष एक्सप्रेस।
4. *बारिश का टेस्ट*
छत टपके, पैर में पानी,
लेट हो जाओ तो सैलरी कटे।
फिर भी "चल रही है ना" कहकर निकल पड़ते हैं।
क्योंकि मुंबई रुकती नहीं,
और मुंबईकर भी नहीं।
लोग कहते हैं "मुंबई भागमभाग है"
अरे भाई, भागमभाग नहीं...
ये रोज 20 लाख लोगों का अग्निपरीक्षा है।
यहां टूटकर भी आदमी "अगली लोकल पकड़ता है"
यहां रोकर भी आदमी "डिब्बा बदल लेता है"
यहां हारकर भी आदमी "दादर पर चेंज करता है"
इसलिए सलाम उस लड़के को
जो विरार से आता है,
सलाम उस लड़की को
जो पनवेल से पढ़ने जाती है।
तुम्हारी पसीने वाली शर्ट,
और जूते में लगा कीचड़,
यही तुम्हारा मेडल है।
क्योंकि मुंबई लोकल सिखाती है -
"गिरो तो भी हाथ मत छोड़ो,
दरवाजा बंद हो तो भी हौसला मत छोड़ो।"
एक दिन आएगा,
आज जो लोकल में लटके हो,
कल उसी शहर में ऑफिस की गाड़ी में चलोगे।
तब खिड़की से देखकर कहना -
"यहीं से शुरू किया था... इसी संघर्ष से।"
-देव कुमार पटेल
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