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खामोशी का जवाब

                
                                                         
                            ख़ामोशी का जवाब
                                                                 
                            

तेरी ख़ामोशियों को पढ़ना भी एक हुनर सा लगा,
जो तूने कहा नहीं, वो भी मुझे मुकम्मल सा लगा।

तेरी निगाहों में जो ठहरी हुई सी बात मिली,
वो किसी किताब में लिखी कहाँ मिलती है कभी।

शब-ए-हिज्र में तेरा ख़याल मेरा हमसफ़र रहा,
तू दूर होकर भी हर पल मेरे करीब रहा।

न इकरार की ज़िद थी, न वादों की कोई आस,
फिर भी तेरे नाम से धड़कता रहा मेरा एहसास।

तूने ख़ामोशी में जो मोहब्बत लिख दी थी,
मैंने हर धड़कन से उसकी इबारत पढ़ ली थी।

शायद इश्क़ का सबसे हसीन रूप यही होता है—
दो दिल चुप रहें, फिर भी एक-दूजे को समझते रहें।

तूने निगाहों से जो दास्तान अधूरी छोड़ी थी,
मैंने अपनी ख़ामोशी से उसे पूरी कर दी।
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एक घंटा पहले

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