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जिंदगी कोई सीधी लकीर नहीं

                
                                                         
                            जिंदगी कोई सीधी लकीर नहीं,
                                                                 
                            
जिंदगी तो एक नदी है,
कभी शांत, कभी तूफान,
कभी किनारे से मिलती है,
कभी किनारे छोड़ देती है।

जिंदगी में सब मिलेगा,
खुशी भी, गम भी,
अपने भी, पराये भी,
पर याद रखना,
जो मिला है वो तुम्हारा नहीं,
जो तुम हो वही तुम्हारा है।

लोग कहते हैं जिंदगी छोटी है,
मैं कहता हूँ,
जिंदगी छोटी नहीं,
हम जीना देर से शुरू करते हैं,
कल की चिंता में,
आज को खो देते हैं।

गिरना बुरा नहीं,
गिर कर पड़े रहना बुरा है,
टूटना बुरा नहीं,
टूट कर खुद से रूठ जाना बुरा है,
जिंदगी हर रोज़ एक नया मौका देती है,
बस तुम उठने को तैयार रहो।

तो जियो,
ऐसे जियो जैसे आखिरी दिन हो,
हँसो, ऐसे हँसो जैसे दर्द कभी हुआ ही न हो,
प्रेम करो, ऐसे करो जैसे मीरा ने किया,
ध्यान करो, ऐसे करो जैसे कबीर ने किया।

क्योंकि अंत में
पैसा नहीं, नाम नहीं,
बस यही पूछा जाएगा -
तुम जिये थे, या सिर्फ जिंदगी काटी थी?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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