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ध्यान में बैठना नहीं होता

                
                                                         
                            ध्यान आँख बंद करना नहीं,
                                                                 
                            
ध्यान तो आँख खोलना है,
बाहर की नहीं,
भीतर की आँख खोलना है।

ध्यान में बैठना नहीं होता,
ध्यान में मिटना होता है,
जैसे नदी मिट जाती है सागर में,
जैसे धूप मिट जाती है शाम में,
वैसे ही तुम मिट जाओ खुद में।

शोर बाहर नहीं,
शोर तो भीतर है,
विचारों का, इच्छाओं का,
डर का, कल का,
ध्यान उस शोर में
एक मौन की लौ जलाना है।

साँस आ रही है, जा रही है,
तुम कुछ नहीं कर रहे,
बस देख रहे हो,
यही देखना ही ध्यान है,
साक्षी हो जाना ही ध्यान है।

ध्यान से तुम शांत नहीं होते,
तुम्हें पता चलता है
तुम तो सदा से शांत थे,
बस बीच में विचार आ गए थे।

तो आज कुछ मत करो,
बस बैठ जाओ,
खुद के साथ,
खुद में,
और देखो -
तुम नहीं रहे,
बस ध्यान रह गया।
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4 hours ago

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