क्यों पूनम का वो चांद नहीं आता है?
क्यों पपीहा अब वो गीत नहीं गाता है?
कहाँ जाड़ों की सोंधी धूप की मुस्कान गयी?
क्यों भौरा फूल में वो पराग नहीं पाता है?
हर ख्वाब हकीकत था, खयाल रुबरु था,
आज हकीकत पर एतबार नहीं आता है।
चूड़ियों की खन खन, पग पायलों की छमछम,
क्यों अब सावन, वो मल्हार नहीं गाता है?
कुछ तो था ,जो आज मेरे पास नहीं,
क्यों यह जहान शमशान नजर आता है?
"वो" थे तो पतझड़ भी ,था गंध मकरंद भरा,
अब तो बसन्त बिन बहार चला जाता है।
क्यों पूनम का वो चांद नहीं आता है?
क्यों बसन्त बिन बहार चला जाता है?
-देवेन्द्र सिंह चौहान
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