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आये ही क्यों थे

                
                                                         
                            यूँ ही छोड़ना था, तो आये ही क्यों थे?
                                                                 
                            
दो कदम साथ मेंरे , बढ़ाये ही क्यों थे?

अंधेरे मेरे मन को भाने लगे थे
जुगनू बनके जरा, टिमटिमाये ही क्यों थे?
यूँ ही , ,,

मै खुश था वीरान खण्डहर में आके,
ख्वाब महलों के झूठे दिखाये ही क्यों थे?
यूँ ही,,,,

गर नहीं था सिफा ,तेरी कूवत में कोई
तूने तीर ए मोहब्बत चलाये ही क्यों थे?
यूँ ही,,,

बसाना था घर जो किसी गैर का ही
तो खत खा खा कसमें पठाये ही क्यों थे
यूँ ही,,,

दिल में नहीं थी गर मोहब्बत जरा भी
तो मुझे देखकर मुस्कुराये ही क्यों थे?
यूँ ही,,,,,
-देवेन्द्र सिंह चौहान
 
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एक घंटा पहले

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