आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भारत दर्शन

                
                                                         
                            गगन चूमते हिमालय की कंदराएँ भी कहती है।
                                                                 
                            
पर्वतों के सीने से निकली धौलीधाराए भी कहती है।
सौ रागों में सुशोभित संगीत की बहती धाराए भी कहती है।
हिमपात से ढकी हुई सफेद चादर की ओढ़नी कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

राजस्थान की तपती रेत में ममता की स्पर्श कहती है।
महलों से भरे मरुथल व् राणा पद्मावती की संघर्ष कहती है।
हल्दी घाटी और कुरुक्षेत्र की लाल रणभूमि कहती है।
अजन्ता,कान्फेरी और जूनागढ़ की गुफाएं कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध हैऔर भारत में रहती है।

पंजाब के खेत खलिहान और गुरुओं की वाणी कहती है।
वतन पर मिटने वाले युवाओं की कुर्बानी कहती है।
अयोध्या भूमि और ब्रज की कृष्ण लीलाए कहती है।
गुलमर्ग स्वर्ग की धरती,सियाचीन की ठंडी हवाएँ भी कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

नर्मदा,कृष्णा,कावेरी,गोदावरी और शिव जटा से निकली गंगा कहती है।
हिन्द,प्रशांत,अरब सागर की गहराई और कंचनजंगा कहती है।
मणिपुर के मणिरत्न सी शोभा व् गुवाहाटी की फिजाएं कहती है।
गुरु गोबिन्द,कबीर,मीरा,प्रेमचन्द,पन्त,महादेवी,टैगोर सब की रचनाएँ कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

12 ज्योतिर्लिंग सहित सब तीर्थो में विश्वास यह कहती है।
गंगा आरती और कंकर कंकर में शंकर का वास ये कहती है।
योग ध्यान की सहस्र धारा,भक्ति,शक्ति,प्रेम,तप सब एक स्वर में कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

बिंदिया, चूड़ी, काजल, गजरा, चुनरी, पाजेब सब यही कहती है।
चितौड़,झांसी,मेवाड़,सब दुर्ग की दीवारें भी कहती है।
कुढ़ता धोती,सलवार,साड़ी,चोली घाघरा सब पोशाक ये कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

आलू पूरी,समोसा,डोसा,इडली,पराठा.. और हजारों व्यंजन का स्वाद कहती है।
पश्मीना,खादी,रेशम,सूत,ऊँन सब सूत्र यही कहती है।
दीवाली,होली,ईद,पोंगल,क्रिसमिस हर त्यौहार की उमंग यही कहती है।
ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, तबला, शहनाई, सारंगी,वीणा की तरंग कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

मकर,पदम्,माला,त्रिशूल,गरुड़ सब युद्ध व्यूह रचनाएँ भी कहती है।
वात पित कफ संतुलन करती आयुर्वेद की पंचकर्मा चिकित्साएँ कहती है।
पयातु,थांगला,सिलाबम,गतका,लाठी,कुश्ती सब युद्ध विद्याएँ भी कहती है।
शिल्पग्राम,आंद्रेतता,रघुराजपुर और चोलमण्डल ग्राम की हस्त शिल्प कलाएं कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

भरत नाट्यम,कथक,मोहनी,ओडिसी,घूमर,भंगड़ा,सब नृत्य कलाए कहती है।
आर्यभट्ट,जगदीश,रामानुज और होमीबाबा की हर आविष्कार कहती है।
बुद्ध,महावीर,विवेकानंद की विचारधारा भी कहती है।
सदियों से चली गुरु शिष्य परम्परा भी कहती है।
हम भारत पर मंत्रमुग्ध है और भारत में रहती है।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर