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अन्तःप्रेरणा गौरी

                
                                                         
                            मैं तुम्हारे अंतःस्थ स्थित,
                                                                 
                            
तुम्हारी अन्तःप्रेरणा गौरी हूं।
मैं तुम्हें शुभ,सुंदर,
बनाने का करती प्रयास।
मुझे यह जग जानता है,
भिन्न - भिन्न नामों से।
जिनमें प्रथम नाम......!
राजा दक्ष की पुत्री.....!
शिव की अर्धांगिनी.....!
प्रथम पूज्य सती के रूप में।
जो पति का अपमान,
न कर सकी सहन.....!
और यज्ञ में हो गई स्वाहा।
जिसके वियोग में शिव ....!
सदियों रहे समाधिस्थ.….!
उनकी साधना को,
फलीभूत करने......!
मैं पुनः अवतार लेकर,
राजा हिमालय के घर.....!
पुत्री रूप में आई।
एक तपस्विनी की भांति....!
अपने आराध्य को पाने हेतू.....!
मैंने की कठिन साधना....!
फलस्वरूप मैं बनी अर्धांगिनी,
पुनः अपने स्वामी शिव की।
मैंने उनके साथ हर स्थिति में,
रहने का लिया संकल्प,
क्योंकि साधु प्रवृति शिव.....!
नहीं बंधना चाहते थे....!
गृहस्थी के बंधन में।
एवं अपने जीवन की जटिलता से,
मुझे नहीं बांधना चाहते थे।
उन्हें शंका थी....!
वैभव और सुविधाओं के बिना,
पार्वती कैसे करेगी निर्वाह,
अपने शिव के साथ।
किंतु मैंने कैलाश को अपना
सर्वस्व मान ,उनकी हर शंका को
किया निर्मूल।
कार्तिकेय,अशोक सुंदरी व
विनायक रूपी रत्न,
हमारे पावन प्रेम के,
सुखद परिणाम के फल।
अपने दायित्व निर्वहन,
के साथ-साथ अपने....!
अन्तर्जगत की भी.....!
साधना है परमावश्यक।
तभी होगी वास्तविक प्रगति,
मानवजाति की.....!
स्व अंतर में परम को साधने की कला ही,
तुझे दिखाएगी मुक्ति की राह....!
तेरी खोज ही तेरा मुक्ति राग है....!
उस मुक्ति राग को सुन.....एवं अमल कर....!!!!
- दीपा संजय 'दीप'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 महीने पहले

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