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उधार की आँखें

                
                                                         
                            किसी ने
                                                                 
                            
एक जीवित चेहरे पर
एक शब्द लिख दिया
फिर उस शब्द को
इतनी बार दोहराया
कि चेहरा ही मिट गया।

आवाज़ से
एक वाक्य काटकर
पूरे मनुष्य का अर्थ बना दिया गया।

भीड़ हँसती रही,
और दूर कहीं
एक नदी सूखती रही
फिर वह चेहरा
लंबी धूप में निकला
पसीने ने
दूसरों की लिखी स्याही धो दी
तब पहली बार
भीड़ ने आदमी को देखा,
उस पर लिखा हुआ शब्द नहीं।

और आईना चुपचाप पूछता रहा
हमने उसे देखा था
या किसी और की आँखों से
देखना सीख लिया था?

- देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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