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क्षमा बुद्ध!

                
                                                         
                            क्षमा बुद्ध!
                                                                 
                            
तुम देव ही अच्छे
मैं नहीं चाहती
तुम्हारे जैसा प्रेमी
तुम्हारे जैसा पिता
जो मुझे
छोड़ कर चला जाए
नींद में अकेला..!

2.
मुझे डूबने देना
दूसरों के दुःखों में
तैरने का वरदान मत देना
मैं विचलित रहूं
संसार की पीड़ाओं में
मुझे शांति न देना
मुझे प्रेम देना बुद्ध
सुख का एक कतरा भी न देना...!

बता कर जाते बुद्ध!
वह तुम्हें रोकती नहीं
बल्कि साथ चलती तुम्हारे
सीता हो या फिर
यशोधरा
पुरुष देवता होने पर भी
सदा असफल ही रहा है
यह जानने में
कि स्त्रियां महलों की नहीं
प्रेम की भूखी होती हैं...!

यह संसार दुखमय है
फ़िर भी
मुझे इससे मुक्ति नहीं
यही चाहिए
इसी तृष्णाओं के लोक में
बसता है प्रेम
खिलते हैं फूल
इसी दुखों भरे संसार में
मैंने देखा है खिलखिलाती
निडर स्त्रियों को
तुम्हारे देवलोक में तो
उदास और भयभीत ही
रहती हैं देवियां..!
 
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एक घंटा पहले

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