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ओर बताओ आजकल कविता में क्या लिख रही हो

                
                                                         
                            मैं कविता को देखती हूं
                                                                 
                            
नन्हें–नन्हें फूलों के भेष में
चहकते, उछलते
स्कूल आते
मैंने देखा
बालों में वर्णों की पंखुड़ियों का गुच्छा बांधे
लयबद्ध शब्दों सी बल खाती
सदाबहार सी बेटियां
उतर रही हैं मेरी कक्षा में
जोशीले छोटे लड़के
लड़ते हैं और झट से यारी का हाथ
रख देते हैं साथी के कंधे पर
और इस तरह
मुक्कमल हो जाती है
कई दिनों से अटकी, उलझी सी
कोई अधूरी कविता
मैंने देखा कविता की पंक्तियों को
कक्षा की बैंचों पर तारा पंक्ति सा झिलमिलाते
मैं रोज पढ़ाती हूं
कविता से बच्चों की कविता नुमा कक्षा में
कोई नई कविता
मेरी कविता
अब पन्नों की चादर तान कर नींद नहीं पकाती
वह मेरी कक्षा में पनप रही है
उस उम्मीद भरे बीज की तरह
जो पथरीली जमीन का सीना फोड़ कर उग आएगा किस रोज
या फिर रोशनी की उस पतली तेज़ रश्मि की तरह
जो पुरबिया आसमान की कोख को चीरते हुए
चमक उठेगी उस समय
जब अंधेरे का साम्राज्य अपने शीर्ष पर होगा
आजकल मैं कविताएं लिख रही हूं
रेत , हवा, पानी, पेड़ और मुस्कान पर
हर उस जीव पर
जो सौंदर्य, कला, उपयोगिता के वर्गीकरण से बाहर है
गुमनाम, गंध और सीलन से भरी बस्तियों पर
ऊसर, बंजर, कल्लर जमीनों पर
आजकल मैं कविता लिखती हूं और
छोड़ देती हूं पानी में
जाओ मछली बनो पानी पर राज करो
मैं लिखती हूं बच्चों की सुंदर दुनिया के लिए
तितली, फूल, गीत, नृत्य, खेल जैसी कविताएं
अनगिनत कविताओं को उनके आकाश में छोड़ देती हूं
चमकीले तारें, चाँद, सूरज, चिड़ियाँ बनाकर
मुझे चिंता है
भारी बस्ता और अच्छा दिखने का बोझ
उनकी रीढ़ को कहीं धनुषाकार न बना दे
वो भविष्य में भूल जाएंगे तनकर खड़ा होना
आदतन परंपराओं, समझौतों, मजबूरी, चापलूसी के लिए निहुरना
उन्हें बेचैन नहीं करेगा
वो निर्णय नहीं ले पाएंगे
कहां झुकना है और कहां नहीं
इसलिए एक–एक सीधी तनी हुई कविता
मैं लिख कर बांध देती हूं उनकी पीठ पर
आजकल
बस यही लिख रही हूं
ये सूचना उन मित्रों के लिए
जो पूछते हैं
ओर बताओ आजकल कविता में क्या लिख रही हो
 
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एक घंटा पहले

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