खेत में किसान की
सीमा पर जवान की
जीवन की कीमत नहीं है
किसान देश को
भोजन देता है
जवान देश के सरहद
की रक्षा करता है
दोनों के आँखों को देखो
तो जानो
उनके जीवन के मूल्य
को सभी पहचानो
घोर अंधरी रात में
एक देश की भूख
मिटाने को निकला
एक कंधे पर बन्दूक लिए
चल दिया सभी के जीवन को बचाने
दोनों ही कर्जदार होते है
देश के
बाकि पूरी जनता इन दोनों को
कर्ज से दबा रखी
एक ने परिवार को त्याग दिया
दूजे ने भूख को मारा
तब जाके देश सलामत है
और देश को दो जून
की रोटी नसीब होती है
भला इनकी फिकर किसे होती है
कफन में लिप्त सरीर
जब सीमा से उठाकर
घर लाते है
तव किसान अपना काम छोड़ कर
भाग कर इनके पास आता है
और सोचता है काश हमें भी
तिरंगा नसीब होता
हमारे मरने पर जग रोता
हमारे मरने पर न राजनीती होती
काश हमसे भी किसी से प्रीत होती
कही से भी आवाज आती
जय किसान
जैसे की जय जवान ,लेकिन कुछ
समय तक ही
फिर एक की संतान भूखो मरता है
एक का दर दर ठोकर
दोनों के अंत एक ही राह से
-छबिराम यादव
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